हिप-हॉप आर्टिस्ट दीपा उन्नीकृष्णन ने रिडिफ़.कॉम की दिव्या नायर को बताया कि उनके जैसे कलाकारों को सफलता तक पहुंचने के लिये कितनी कड़ी मेहनत और कितना लंबा इंतज़ार करना पड़ता है।

फोटो: दीपा उन्नीकृष्णन, 25, भारत की कुछ सफल महिला हिप हॉप आर्टिस्ट्स में से एक हैं।

फोटोग्राफ: हितेश हरिसिंघानी/ रिडिफ़.कॉम

गली बॉय — अपना टाइम आयेगा — की थीम राष्ट्रगीत की तरह युवाओं की ज़ुबान पर चढ़ गयी है।

ऐसा लगता है जैसे युवाओं को उनके उद्धार का रास्ता मिल गया है।

यह एक बेहतर कल की उम्मीद जगाता है, यह विश्वास दिलाता है कि मुश्किल दौर बीत जायेगा। इसका कहना है कि आपको चलते, आगे बढ़ते रहना चाहिये। ज़िंदग़ी की बड़ी मंज़िलों की ओर देखना चाहिये।

लेकिन गहराई में उतर कर देखें  तो आप जान पायेंगे कि गली बॉय सिर्फ एक फिल्म नहीं है। ये सच्ची कहानियाँ हैं। अंडरग्राउंड आर्टिस्ट्स की कहानियाँ हैं।

ऐसे कलाकार जिनके पास पैसे नहीं थे। जिन्हें परफॉर्म करने का, सुनने का, नज़र में आने का, महत्व पाने का और अपनी कहानियाँ कहने का मौका नहीं मिल पाता था।

मुंबई के नज़दीक बसे एक शहर कल्याण से आयी, अपने दम पर आगे बढ़ने वाली बहुत ही कम महिला हिप हॉप और रैप आर्टिस्ट्स में से एक, दीपा उन्नीकृष्णन उर्फ़ डी एमसी, ने हमें बताया कि वो क्यों खुश हैं और क्यों कलाकारों के प्रति हमारे व्यवहार से नाराज़ और दुःखी भी हैं। और दुनिया के नज़रें फेर लेने पर कैसे उन्होंने अपनी पहचान और जगह बनाई।

यूं देखा जाये तो दीपा उन्नीकृष्णन का प्रोफाइल मुंबई या इसके उपनगरों में रहने वाले ज़्यादातर मलयाली लोगों के जैसा ही है।

उन्नीकृष्णन पिशारोडी, एक NRI की इस छोटी बेटी का जन्म केरल में हुआ था, लेकिन उनकी परवरिश मुंबई में हुई।

अंधेरी और नालासोपारा से सफ़र करने और रहने के बाद उनके परिवार ने आर्थिक कारणों से कल्याण जाकर रहने का फैसला किया, जब उनके पिता विदेश में काम करके पैसे घर भेजते थे।

दीपा ने पाँच वर्ष की उम्र में भरत नाट्यम क्लास में दाखिला लिया। डांस में उनकी दिलचस्पी और कुदरती हुनर से उन्हें मदद मिली।

अपने स्कूल के वर्षों के दौरान उन्होंने कविताऍं भी लिखीं और उनके कॉम्प्लेक्स में स्थित लोक कल्याण पब्लिक स्कूल में वक्तृत्व और वाद-विवाद में भी हिस्सा लेती रहीं, जो संयोग से उसी साल शुरू हुआ, जिसमें दीपा की अकेडमिक ट्रेनिंग शुरू हुई थी।

ज़्यादातर माता-पिता की तरह, दीपा के माता-पिता चाहते थे कि वो चार्टर्ड अकाउंटंसी पूरी करे, एक अच्छी नौकरी करे और फिर किसी अच्छे घर में शादी कर ले।

और सारे मतभेद और रूढ़िवादी विचारधारा यही एक राह दिखाती थी।

दीपा उस दबाव के आगे घुटने टेक सकती थीं और किसी 9 से 5 की कॉर्पोरेट नौकरी के साथ नीरस ज़िंदग़ी जी सकती थीं, लेकिन उनके मज़बूत हौसले और आत्मविश्वास ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया, और वो हमेशा अपने सपनों का पीछा करती रहीं, ताकि एक दिन वो दुनिया को गलत साबित कर सकें।

“मैं स्कूल में हमेशा ही हाइपर-ऐक्टिव थी। लेकिन कॉलेज जॉइन करने के बाद ही हिप-हॉप और रैप में मेरी दिलचस्पी जागी,” उन्होंने कल्याण से फोन पर मुझे बताया।

“यह एक आकर्षण के रूप में शुरू हुआ — उनके कपड़े और उनके लुक्स (हिप हॉप डांसर्स के) मुझे हमेशा आकर्षित करते थे। मैंने कोशिश की, लेकिन फिर मुझे लगा कि अब बी-बॉइंग के लिये काफी देर हो चुकी है। लेकिन मैं म्यूज़िक छोड़ नहीं सकती थी। मेरे लिये लिरिक्स ज़्यादा मायने रखते थे,’’ उन्होंने याद करते हुए कहा।

फोटो: एक प्रशिक्षित भरत नाट्यम डांसर, दीपा ने क्लास 6 से ही हिप हॉप सुनना शुरू किया। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला गाना लिखा. फोटोग्राफ्स:  Deepa MC/Facebook के सौजन्य से

दीपा ने 18 वर्ष की उम्र में कॉलेज के पहले साल में अपना पहला गाना लिखा।

“गाना लिखते ही मुझे लगा कि गाना उतना अच्छा नहीं है। वो गाना दिल टूटने और टीनएज ईमो (शन) के बारे में था, मतलब टीनएजर होने से जुड़ी प्रॉब्लम्स के बारे में.”

अपने पहले गाने की ही तरह, उन्हें अपना आर्टिस्ट नेम ‘ऑरा’ भी पसंद नहीं आया।

“मुझे यह नाम किसी और का सा लगता था,” उन्होंने बताया। एक साल बाद उन्होंने अपना नाम डी एमसी रखा (एमसी यानि कि माइक्रोफोन कंट्रोलर)।

दीपा को इंटरनेट से उभरने का गर्व है। और उनका मानना है कि उन्हें अपने सपनों के पीछे भागने का हौसला यहीं से मिला।

2012 में, उन्होंने एक वीडियो अपलोड किया, जो निकी मिनाज के गाने का कवर था। “डोंबिवली (मुंबई के नज़दीक स्थित एक और शहर) से किसी ने मुझसे कहा कि यह (हिप हॉप) पाँच साल से चल रहा है और अगर मैं सीरियस हूं, तो मुझे कल्याण से बाहर निकलना चाहिये।”

ज़्यादातर अंडरग्राउंड आर्टिस्ट्स की तरह, दीपा ने न तो कभी कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली और न ही उनका कोई मेन्टर था।

लेकिन वो कोई किस्मत से बनी कलाकार नहीं हैं। उन्हें पता था कि वो क्या कर रही हैं।

“डैड के विदेश में काम करने के कारण, मैं उन लकी टीनएजर्स में से थी, जिन्हें इंटरनेट की सुविधा ज़िंदग़ी में जल्दी मिल जाती है। छठे ग्रेड से ही मैं इंटरनेट से म्यूज़िक डाउनलोड करती थी; जिनमें से कुछ साइ्ट्स अब हैं भी नहीं।

कॉलेज में जाने के बाद उन्होंने हिप हॉप कल्चर के बारे में पढ़ना और रीसर्च करना शुरू किया। “मैं इसका इतिहास पढ़ कर दंग रह गयी। इसे लिखने वाले बहुत ही जानकार लोग हैं।”

जब हर कोई कमर्शियल रैप में उलझा था, तब दीपा “70s, 80s और 2000 की शुरुआत के पुराने हिप हॉप में ज़्यादा दिलचस्पी रखती थीं। पहले मैं रैप वाले बॉलीवुड के गाने चुनती थी और उन्हें  याद करती थी। उस समय मुझे इसमें बड़ा मज़ा आता था।”

 

फोटो: दीपा एक अंतर्राष्ट्रीय टूर के दौरान अपनी म्यूज़िक फैमिली — असिफ़ुल इस्लाम सोहम, प्रीतेश वारिया और नवेद शेख़ के साथ।

दीपा को पता था कि अपने हुनर को तराशने के लिये उन्हें किन कलाकारों को सुनना चाहिये।

“मुझे जे ज़ी, क्रूक्ड आइ पसंद थे; लेकिन आर्टिस्ट्स को सुनने के मामले में बहुत ही चूज़ी थी। मुझे एमिनेम पसंद हैं, स्लिम शेडी नहीं। मुझे साफ़ पता था कि मुझे महिला-विरोधी और ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक बोल पसंद नहीं। इसमें इमोशन्स, एक ह्यूमन टच या एक मेसेज ज़रूर होना चाहिये।”

इंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद सीए का क्वॉलिफाइंग टेस्ट दो बार फेल करने के बाद, दीपा को लगा कि अब उनके माता-पिता को सच से समझौता करना ही होगा।

“मैंने उन्हें बताया कि (दि इंस्टिट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटंट्स ऑफ़ इंडिया ) इंस्टिट्यूट जान बूझ कर कुछ मार्क्स के लिये स्टूडेंट्स को फेल कर देता है। यह बेहद निराशाजनक था। मैं दो और तीन मार्क्स के लिये फेल कर दी गयी थी। मेरे माता-पिता यह मानने को तैयार नहीं थे कि हर बार गलती मेरी ही नहीं होती।”

2014 से 2016 के बीच, दीपा ने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिये न चाहते हुए भी वेबसाइट्स के लिये लिखने जैसे छोटे-मोटे काम शुरू किये, ताकि वो घर से बाहर प्रैक्टिस शुरू कर सकें।

“मैं काम के लिये कल्याण से ग्रांट रोड (साउथ मुंबई) जाती थी। कल्याण बहुत दूर है, आपको पता ही होगा! मुझे ये बिल्कुल पसंद नहीं था,” उन्होंने कहा।

“और मुझे लिखना होता था कि कौन सी हॉलीवुड या मलयालम फिल्म ने कितने पैसे कमाये। ये काम बिल्कुल एक्साइटिंग नहीं था; मैंने इसे सिर्फ पैसों के लिये किया था,” उन्होंने बताया।

उन्हें उनकी अड़चनों के बारे में पूछने पर आपको लगेगा जैसे आपने उनकी दुखती रख पर हाथ रख दिया हो।

“हम (आर्टिस्ट्स) अपने स्ट्रगल्स के बारे में बात नहीं करना चाहते; 8-10 साल पुरानी चीज़ों की बात करके क्या फायदा? आइ मीन, आप लोग तब कहाँ थे जब हमें एक्सपोज़र की ज़रूरत थी, हमारा सपोर्ट करने वाले एक प्लैटफॉर्म की ज़रूरत थी? अब जब एक फिल्म रिलीज़ हो गयी है और एक ऐक्टर उसे प्रमोट कर रहा है, जनवरी और फरवरी से लोग लोग हमारे पास आ रहे हैं और हमारी कहानियाँ जानने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।”

“पूरे सम्मान के साथ मैं कहना चाहूंगी कि गली बॉय ने बस हमें लोगों के सामने रखा है। कुछ साल पहले तक लोग हमपर हँसे हैं, हमारा मज़ाक उड़ाया है, और हमें नीचा दिखाया है।”

“हमने अपना सपोर्ट ग्रुप खुद ढूंढा और बनाया है। हम एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने और एक-दूसरे के काम को प्रमोट करने के लिये एक-दूसरे के वीडियो में परफॉर्म करते हैं।”

वीडियो: डी एमसी से उनके परिवार के बारे में सुनें और जानें कि उन्होंने कैसे खुद को अपने सपनों की पीछे भागने का हौसला दिया। वीडियो: Hitesh Harisinghani/Rediff.com

 

 

फोटो: दीपा, बिल्कुल बायें, उनके पिता उन्नीकृष्णन पिशारोडी, जो दम्माम, सऊदी अरेबिया में काम करते हैं, बड़ी बहन दिव्या जिनकी शादी हो चुकी है, और माँ जयश्री के साथ, जो एक गृहिणी हैं।

दीपा अपने परिवार से बहुत ज़्यादा प्यार करती हैं, लेकिन बताती हैं कि उन्हें परिवार या दोस्तों से कोई सहयोग नहीं मिला।

“मेरे परिवार ने कभी मुझे सीरियसली नहीं लिया। उन्होंने हमेशा मेरे काम को अनदेखा किया। प्रैक्टिस के लिये घर से बाहर निकलना या कहीं देर तक रुकना बेहद मुश्किल था। मेरा मतलब है कि कल्याण इतनी दूर है कि यहाँ कोई कुछ बनने की सोच ही नहीं सकता।”

“जब आप पढ़ाई करते हैं और कमाते नहीं हैं, तो आपको अपने माता-पिता को जवाब देना पड़ता है। वो जानना चाहते हैं कि आप क्या कर रहे हैं, आप घर कब आयेंगे। वो नहीं समझते कि आप क्या करने की कोशिश कर रहे हैं।”

“उन्हें हिप हॉप की हिस्ट्री नहीं पता और वो नहीं चाहते कि हम अपना भविष्य और अपनी ज़िंदग़ी किसी ऐसी चीज़ में लगायें, जिसमें हम विश्वास नहीं रखते।”

2015 से पहले, लोग हिप हॉप में दिलचस्पी ही नहीं रखते थे।

“यह अमीरों और बड़े लोगों की चीज़ थी, क्योंकि वे ही इसे खरीद सकते थे।

मेरे गली में के बाद लोगों का इस ओर ध्यान गया, जिसका श्रेय डिवाइन और नेज़ी को जाता है।

सेन्स और तोड़फोड़ का भी ज़िक्र होना चाहिये, उन्होंने मुझे याद दिलाया।

लेकिन इसे देर से मिली पहचान का कारण वो भारत में दिलचस्पी और जानकारी की कमी बताती हैं।

“नेपाल में कुछ लोग हैं जो म्यूज़िक बनाते हैं और उनके लाखों सब्सक्राइबर हैं। लेकिन भारत में, अच्छे कलाकारों को सिर्फ दो डिजिट में व्यूज़ मिलते हैं। आप लोग किसी और से क्यों सुनने का इंतज़ार करते हैं कि भारत में अच्छा म्यूज़िक बनाया जा रहा है?”

 

फोटो: मेन्स्ट्र्अल हाइजीन डे के लिये, दीपा ने माहवारी से जुड़ी बेड़ियों को तोड़ने के लिये नो मोर लिमिट्स गाना लिखा।

जल्दी इस क्षेत्र में कदम रखने के लिये दीपा खुद को बेहद लकी मानती हैं।

“जब किसी सर्किट में 20 से 30 लड़के हों और एक भी लड़की ना हो, तो आप पर लोगों की नज़र ज़रूर पड़ेगी। प्रोड्यूसर्स भी फीमेल रैपर्स को ज़्यादा पैसे देते हैं क्योंकि अच्छी फीमेल रैपर्स बहुत ही कम हैं।”

दीपा की कहानी तब बदली, जब 2017 में उन्हें पहले यूके और फिर जर्मनी में परफॉर्म करने के लिये आमंत्रित किया गया।

“यह 25 दिनों का टूर था। मैं मुझे साइन करने वाले प्रोड्यूसर सुनीत से मिली, ताकि मैं 10 दिन और रह कर एक ऐल्बम शूट कर सकूं, जो मार्च में रिलीज़ होगा,” उन्होंने कहा।

दीपा ने कई स्वदेशी प्रोजेक्ट्स पर काम किया, जिनमें मेन्सट्रुअल हाइजीन डे के लिये और महिंद्रा एजुकेशन ट्रस्ट के साथ नेशनल गर्ल चाइल्ड डे के प्रोजेक्ट्स शामिल हैं।

साथ ही उन्होंने एक डॉक्युमेंट्री सीरीज़ का एक हिस्सा भी प्रोड्यूस किया है, जिसमें पैरा स्विमर माधवी लता द्वारा चलाये जा रहे भारतीय व्हीलचेयर डिसेबल्ड बास्केटबॉल फेडरेशन को दिखाया गया है, और यह भी इसी साल रिलीज़ होगा।

यह बेहद लंबा, अकेलेपन से भरा सफर रहा है और मैंने काफी सब्र रखा है, उन्होंने बताया।

दीपा यह कहने में झिझकती नहीं हैं कि एक अंडरग्राउंड आर्टिस्ट के रूप में उनके काम में उनके परिवार ने न तो दिलचस्पी दिखाई है और न ही उनका साथ दिया है।

“मैं जब उन्हें कुछ दिखाती थी, तो वो सुनते तो थे, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपने सोशल मीडिया या अपने दोस्तों के साथ शेयर नहीं किया। उन्होंने कभी ये तक नहीं कहा कि ये कोई सच्चा टैलेंट है। वो बस इसे नकारते रहे, जैसे कि ये एक दौर है, जो वक्त के साथ खत्म हो जायेगा,” उन्होंने कहा।

उन्हें सुनने के बाद मैं ये जानने के लिये उत्सुक हो गयी कि उनके माता-पिता अब अपनी बेटी के बारे में क्या सोचते हैं।

“मेरे यूके टूर के बाद, उन्होंने मुझे सीरियसली लेना शुरू किया। अब वो मेरे बोले बिना भी मेरे वीडियोज़ शेयर करते हैं और इसके बारे में बात भी करते हैं, लेकिन अभी भी उनके लिये ये कोई बड़ी बात नहीं है।”

तो अपनी बेटी को मिली पहचान, प्रसिद्धि और और सफलता को वो कैसे देखते हैं?

“उन्हें इनमें दिलचस्पी नहीं है। ऐसा लगता है कि उन्हें किसी ने कुछ बोलने के लिये कहा है इसलिये वो कुछ शब्द बोल देते हैं। उनके रुचि न लेने के कारण अब उनसे पूछने में मेरी रुचि भी चली गयी है,” उन्होंने बताया।

 

फोटो: 2017 में देसी हिप हॉप नामक एक लाइफ़स्टाइल और डिजिटल मीडिया कंपनी की एडिटर-इन-चीफ़ के पद पर नियुक्त की गयी दीपा हिप हॉप को युवाओं को बेहतर, ज़िम्मेदार नागरिक बनने के लिये बढ़ावा देने का एक माध्यम मानती हैं।

फोटोग्राफ: Hitesh Harisinghani/Rediff.com

शायद चिंता, दुःख या दुःख के अभाव के कारण दीपा ने अपने चारों ओर एक दीवार सी बना ली है, जिसे कोई पार नहीं कर सकता।

“मैं अपनी कमज़ोरियों को खुद पर हावी नहीं होने देती। इस प्रोफेशन में, लोग आपकी कमज़ोरी सूंघ लेते हैं। इसलिये मैं अपने इस स्ट्राँग ऐटिट्यूड को साथ लेकर घर से बाहर निकलती हूं।,” उन्होंने बताया।

दीपा की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह है कि किस तरह कई पीढ़ियों से हिप हॉप को गलत समझा जा रहा है।

“हिप हॉप समेत हर म्यूज़िक जॉनर का अपना इतिहास है। लोगों को इसके बारे में पढ़ना चाहिये और भूलना नहीं चाहिये कि इसकी शुरुआत क्यों हुई थी। मैं चाहती हूं कि मेरा म्यूज़िक युवाओं तक पहुंचे, उन्हें इतिहास रचने का हौसला दे। इसका मकसद है जानकारी बाँटना, उन्हें वोटिंग, बेटियों की पढ़ाई, माहवारी के समय हाइजीन का महत्व बताना। मैं ब्रिटिश काल से पहले के भारत की कहानी बताना चाहती हूं — कैसे हमारे राजाओं ने हमपर शासन किया, कैसे हम ब्रिटिश लोगों से लड़े।”

कुछ बनने की चाह रखने वाले आर्टिस्ट्स को सलाह देते हुए उन्होंने कहा: “इसमें फिल्म के कारण मत उतरो। इसमें तभी उतरो जब तुम्हें लगता हो कि तुम्हें यही करना सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है। पढ़ो। अपने आस-पास के माहौल को समझो। अगर यह माहौल तुम्हें लिखने का हौसला देता है, तो लिखो। अपनी सोच लिखो, अपनी पहचान ढूंढो।”

“अगर तुम्हें पता है कि तुम अच्छा कर सकते हो, तो लोगों की बात मत सुनो। लोगों को बोलने दो, उसे फैसला मत मान लो और उसका असर खुद पर मत पड़ने दो।”

दीपा का एक छुपा हुआ सपना भी है।

“मैं हमेशा कहती हूं कि मैं दलाई लामा जैसी बनना चाहती हूं। उन्होंने बिल्कुल सही सवाल उठाये हैं। वो इतने ज्ञानी हैं कि सरकार भी उन्हें मरवा देना चाहती है। मैं ऐसी ही क्रांति लाना चाहती हूं।”

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